अक्सर तुम शाम को घर आ कर पूछते

अक्सर तुम शाम को घर आ कर पूछते
आज क्या क्या किया??
मैं अचकचा जाती
सोचने पर भी जवाब न खोज पाती
कि मैंने दिन भर क्या किया 
आखिर वक्त ख़्वाब की तरह कहाँ बीत गया..
और हार कर कहती ‘कुछ नही’
तुम रहस्यमयी ढंग से मुस्कुरा देते!!

उस दिन मेरा मुरझाया ‘कुछ नही’ सुन कर
तुमने मेरा हाथ अपने हाथ मे लेकर कहा
सुनो ये ‘कुछ नही’ करना भी हर किसी के बस का नहीं है
सूर्य की पहली किरण संग उठना
मेरी चाय में ताज़गी 
और बच्चों के दूध में तंदुरुस्ती मिलाना
टिफिन में खुशियाँ भरना
उन्हें स्कूल रवाना करना
फिर मेरा नाश्ता
मुझे दफ्तर विदा करना
काम वाली बाई से लेकर
बच्चों के आने के वक्त तक
खाना कपड़े सफाई 
पढ़ाई
फिर साँझ के आग्रह
रात के मसौदे..
और इत्ते सब के बीच से भी थोड़ा वक्त
बाहर के काम के लिए भी चुरा लेना
कहो तो इतना ‘कुछ नही’ कैसे कर लेती हो

मैं मुग्ध सुन रही थी
तुम कहते जा रहे थे

तुम्हारा ‘कुछ नही’ ही इस घर के प्राण हैं
ऋणी हैं हम तुम्हारे इस ‘कुछ नही’ के
तुम ‘कुछ नही’ करती हो तभी हम ‘बहुत कुछ’ कर पाते हैं
तुम्हारा ‘कुछ नही’
हमारी निश्चिंतता है 
हमारा आश्रय है
हमारी महत्वाकांक्षा है..
तुम्हारे ‘कुछ नही’ से ही ये मकां घर बनता है
तुम्हारे ‘कुछ नही’ से ही इस घर के सारे सुख हैं
वैभव है..

मैं चकित सुनती रही 
तुम्हारा एक एक अक्षर स्पृहणीय था 
तुमने मेरे समर्पण को मान दिया
मेरे ‘कुछ नही’ को सम्मान दिया

अब ‘कुछ नही’ करने में मुझे कोई गुरेज़ नही
बस तुम प्रीत से मेरा मोल लगाते रहना
मान से मेरा श्रृंगार किया करना.

निधि सक्सेना

‘Tea For Five’ watercolor print by Etsy shop Alicia’s Infinity.

I borrow Nidhi Saxena’s words to help me say to my husband what I’ve been struggling to tell him all these years. He has never- not once- judged me for my unproductive phases, or for the irrational terror and paralysis and stuck-ness that come with depression. Evening after evening after evening, he’s returned home to gently ask how my day was and what I did. As I’ve struggled to articulate how little I accomplished, how terribly worthless I feel, how wracked I am with guilt for burdening him with my existence, how underserving I feel of his kindness and his sweetness, he’s enveloped me in a silent bear hug that says more than words ever can.

He’s never waited for a reply. He’s always asked, but he’s never let me get the words out. I set great store by words and believe that once uttered or written, they are like incantations- they become the truth, turn things real. He’s never let me give words to my feelings of worthlessness. For that, I am thankful every day.

To anyone who loves or lives with a partner suffering from a mental illness or an episode of depression, this is the most compassionate thing you can do. Remind them that their worth isn’t contingent on their productivity. Remind them that they are loved unconditionally.

Also, to the women whose invisible labour- emotional or otherwise- goes unacknowleged- I see you. You are worthy, and you are important.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s